दुर्गा कवच के सभी 56 श्लोक मूल संस्कृत, Roman लिप्यंतरण और सरल हिन्दी भावार्थ के साथ पढ़ें।

दुर्गा देवी कवच पाठ

सरल हिन्दी भावार्थ मूल संस्कृत पाठ को समझने के लिए है। प्रत्येक क्रमांक मूल पाठ के मन्त्र-क्रमांक से मेल खाता है; कुछ मन्त्र आधे श्लोक या वक्ता के कथन हैं।

श्री दुर्गा देवी कवच

अथ श्री देव्याः कवचम्। ॐ इस श्रीचण्डीकवच के ब्रह्मा ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, चामुण्डा देवता हैं, अङ्गन्यासोक्त मातरः बीज है, दिग्बन्ध देवता तत्त्व है, श्रीजगदम्बा की प्रीति के लिए सप्तशती पाठ के अङ्ग के रूप में इसके जप का विनियोग किया गया है। ॐ नमश्चण्डिकायै॥ मन्त्र 1 मार्कण्डेय ने कहा - हे पितामह! जो मनुष्यमात्र की सभी प्रकार से रक्षा करने वाला, संसार में अति गोपनीय और परम उत्तम है तथा जो आज तक किसी से नहीं कहा गया, वह मुझे बताइए। मन्त्र 2 ब्रह्मा ने कहा - हे ब्राह्मण! समस्त प्राणियों का उपकार करने वाला यह अतिशय गोपनीय और पवित्र देवी का कवच है, उसे हे महामुने! आप सुनिए। मन्त्र 3 पहला रूप शैलपुत्री है, दूसरा ब्रह्मचारिणी है, तीसरा चन्द्रघण्टा है और चौथा कूष्माण्डा है। मन्त्र 4 पाँचवाँ रूप स्कन्दमाता है, छठा कात्यायनी है, सातवाँ कालरात्रि है और आठवाँ महागौरी है। मन्त्र 5 नौवाँ रूप सिद्धिदात्री है। ये नौ दुर्गा कही गई हैं। महात्मा ब्रह्मा जी द्वारा ही ये नाम कहे गए हैं। मन्त्र 6 जो पुरुष अग्नि से जल रहा हो, शत्रुओं के बीच में फँस गया हो, युद्ध में, विषम संकट में तथा दुर्गम स्थानों में फँसा हुआ हो और भय से आर्त होकर शरण में आया हो, मन्त्र 7 रणसंकट में उसे कभी कुछ भी अशुभ नहीं होता। मैं उसका कोई अमङ्गल नहीं देखता हूँ; उसे शोक, दुःख और भय कभी नहीं होते। मन्त्र 8 जिन्होंने भक्तिपूर्वक तुम्हारा स्मरण किया है, निस्संदेह उनकी वृद्धि होती है। हे देवेशि! जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, उनकी तुम रक्षा करती हो, इसमें कोई संशय नहीं है। मन्त्र 9 प्रेत पर सवार रहने वाली चामुण्डा हैं, महिषा पर सवार वाराही हैं, एन्द्री हाथी पर आरुढ़ हैं और वैष्णवी गरुड़ पर आसीन हैं। मन्त्र 10 माहेश्वरी वृषारूढ़ हैं, कौमारी मयूर पर सवार हैं, लक्ष्मी देवी पद्मासना हैं तथा हाथ में कमल लिए हुए हरिप्रिया हैं। मन्त्र 11 श्वेत रूप धारण करने वाली, ईश्वरी, वृषवाहन पर सवार, हंस पर आसीन ब्राह्मी तथा सभी आभूषणों से भूषित देवियाँ हैं। मन्त्र 12 ये सभी मातरः (मातृकाएँ) समस्त योगों से युक्त, अनेक आभूषणों की शोभा से युक्त और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित दिखाई देती हैं। मन्त्र 13 क्रोध से भरी हुई ये देवियां रथों पर सवार दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मुसल, मन्त्र 14 खेटक (ढाल), तोमर, परशु (फरसा), पाश, कुन्तायुध, त्रिशूल तथा उत्तम धनुष शार्ङ्ग को धारण करती हैं। मन्त्र 15 दैत्यों के शरीर का नाश करने के लिए, भक्तों को अभय देने के लिए तथा देवताओं का हित करने के लिए ही वे इस प्रकार आयुधों को धारण करती हैं। मन्त्र 16 हे महारौद्रे, महाघोर पराक्रमी, महाबले, महोत्साहे और महाभय का नाश करने वाली! आपको नमस्कार है। मन्त्र 17 हे दुष्प्रेक्ष्य (जिसे कठिनाई से देखा जा सके ऐसी), शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली देवी! मेरी रक्षा कीजिए। पूर्व दिशा में एन्द्री मेरी रक्षा करें और आग्नेय कोण में अग्निदेवता मेरी रक्षा करें। मन्त्र 18 दक्षिण दिशा में वाराही रक्षा करें, नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी रक्षा करें, पश्चिम दिशा में वारुणी रक्षा करें और वायव्य कोण में मृगवाहिनी रक्षा करें। मन्त्र 19 उत्तर दिशा में कौमारी रक्षा करें और ईशान कोण में शूलधारिणी रक्षा करें। इसी प्रकार ऊपर ब्रह्माणि मेरी रक्षा करें और नीचे वैष्णवी रक्षा करें। मन्त्र 20 इस प्रकार शव पर वाहन करने वाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं की रक्षा करें। जया आगे मेरी रक्षा करें और विजया पीछे मेरी रक्षा करें। मन्त्र 21 अजिता बाईं ओर और अपराजिता दाईं ओर रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करें और उमा मस्तक पर स्थित होकर रक्षा करें। मन्त्र 22 मालाधरी ललाट की और यशस्विनी भृकुटियों की रक्षा करें। त्रिनेत्रा दोनों भृकुटियों के मध्य भाग की और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें। मन्त्र 23 शङ्खिनी दोनों आँखों के मध्य में, द्वारवासिनी दोनों कानों में, कालिका दोनों कपोलों की और शाङ्करी कर्णमूल की रक्षा करें। मन्त्र 24 नासिका में सुगन्धा, ऊपर के ओंठ में चर्चिका, नीचे के ओंठ में अमृतकला और जिह्वा में सरस्वती रक्षा करें। मन्त्र 25 कौमारी दाँतों की रक्षा करें, चण्डिका कण्ठ देश की रक्षा करें, चित्रघण्टा घण्‍टिका की और महामाया तालु की रक्षा करें। मन्त्र 26 कामाक्षी ठुड्डी की रक्षा करें, सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करें, भद्रकाली ग्रीवा की और धनुर्धरी रीढ़ की हड्डी की रक्षा करें। मन्त्र 27 नीलग्रीवा बाहर के कण्ठ की और नलकूबरी श्वास नली की रक्षा करें। खङ्गिनी दोनों कंधों की रक्षा करें और वज्रधारिणी मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें। मन्त्र 28 दण्डिनी दोनों हाथों की रक्षा करें, अम्बिका उँगुली की रक्षा करें, शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें और कुलेश्वरी कुक्षि (पेट के दोनों पार्श्व) की रक्षा करें। मन्त्र 29 महादेवी स्तनों की रक्षा करें, शोकविनाशिनी मन की रक्षा करें। ललिता देवी हृदय की रक्षा करें और शूलधारिणी उदर की रक्षा करें। मन्त्र 30 कामिनी नाभि की रक्षा करें, गुह्येश्वरी गुह्य (गोप्य अंग) की रक्षा करें। पूतना और कामिका मेढ्र की रक्षा करें तथा महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें। मन्त्र 31 भगवती कटि (कमर) की रक्षा करें, विन्ध्यवासिनी दोनों घुटनों की रक्षा करें। महाबला और सर्वकामप्रदायिनी दोनों जंघाओं की रक्षा करें। मन्त्र 32 नारसिंही दोनों टखनों की रक्षा करें और तैजसी पादपृष्ठ (पैर के ऊपरी भाग) की रक्षा करें। श्री पाद की उँगुलियों की रक्षा करें और तलवासिनी पाँवों के नीचे के तलवे की रक्षा करें। मन्त्र 33 दंष्ट्राकराली नखों की रक्षा करें, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की रक्षा करें। कौबेरी रोमकूपों की रक्षा करें तथा वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें। मन्त्र 34 पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि और मेद की रक्षा करें। कालरात्रि आँतों की रक्षा करें और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें। मन्त्र 35 पद्मावती हृदयकमल की और चूड़ामणि कफ की रक्षा करें। ज्वालामुखी नाखूनों की आभा की और अभेद्या शरीर के सभी जोड़ों की रक्षा करें। मन्त्र 36 ब्रह्माणी मेरे शुक्र की रक्षा करें और छत्रेश्वरी छाया की रक्षा करें। धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें। मन्त्र 37 प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—इन पाँचों वायुओं की तथा प्राण की रक्षा वज्रहस्ता एवं कल्याणशोभना देवी करें। मन्त्र 38 रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श में योगिनी रक्षा करें। नारायणी सदा सत्त्व, रज और तम गुणों की रक्षा करें। मन्त्र 39 वाराही आयु की रक्षा करें, वैष्णवी धर्म की रक्षा करें। चक्रिणी यश, कीर्ती, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें। मन्त्र 40 इन्द्राणी मेरे गोत्र की रक्षा करें, चण्डिका मेरे पशुओं की रक्षा करें। महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की रक्षा करें और भैरवी मेरी पत्नी की रक्षा करें। मन्त्र 41 सुपथा (सुपथ) मार्ग की रक्षा करें तथा क्षेमकरी रास्ते की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी और सब ओर विजया स्थित रहकर रक्षा करें। मन्त्र 42 जो स्थान रक्षा से हीन हो और कवच से वर्जित हो, हे देवि! जयन्ती और पापनाशिनी उस सबका संरक्षण करें। मन्त्र 43 जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता हो, वह कवच से सर्वदा आवृत्त (सुरक्षित) होकर जहाँ-कहाँ भी जाए, एक पद भी बिना कवच के न चले। मन्त्र 44 वह जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहां उसे धन का लाभ और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाली विजय प्राप्त होती है। जिस-जिस मनःकामना का वह चिन्तन करता है, उस-उस को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस भूतल पर अतुलनीय परम ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। मन्त्र 45 कवच से सुरक्षित मनुष्य भयमुक्त हो जाता है, युद्धों में अपराजित रहता है और तीनों लोकों में पूजनीय होता है। मन्त्र 46 देवताओं के लिए भी दुर्लभ इस देवी कवच को जो व्यक्ति श्रद्धा और संयम से प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पढ़ता है, मन्त्र 47 उसे दैवी कला प्राप्त होती है और वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है। वह अकालमृत्यु से रहित होकर सौ वर्ष से अधिक आयु तक जीवित रहता है। मन्त्र 48 उसके मकड़ी और विस्फ़ोटक (चेचक आदि) रोग तथा अन्य सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। स्थावर (पेड़-पौधे आदि), जङ्गम (जीव-जन्तु) तथा कृत्रिम—किसी भी प्रकार का विष हो, वह सब नष्ट हो जाता है। मन्त्र 49 इस भूतल पर जितने भी अभिचार (प्रयोग), मन्त्र, यन्त्र और भूचर, खेचर, जलज तथा उपदेशक (मन्त्रसिद्ध) हैं, मन्त्र 50 सहज, कुलज, माला, डाकिनी, शाकिनी तथा अंतरिक्ष में विचरने वाली महाबली और घोर डाकिनियाँ हैं, मन्त्र 51 ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि, मन्त्र 52 हृदय में कवच स्थित होने पर उस पुरुष के दर्शन मात्र से वे सब नष्ट हो जाते हैं। उसकी राज्य में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है और यह कवच परम तेजोवृद्धिकर है। मन्त्र 53 वह पुरुष भूतल पर यश से बढ़ता हुआ कीर्ति से मंडित होता है। अतः पहले कवच का पाठ करके तदनंतर चण्डी सप्तशती का पाठ करना चाहिए। मन्त्र 54 पर्वतों, वनों और काननों सहित पृथ्वीमण्डल जब तक स्थित है, तब तक उसकी पुत्र-पौत्र रूपी सन्तति पृथ्वी पर बनी रहती है। मन्त्र 55 देह के अंत में वह पुरुष महामाया की कृपा से देवताओं के लिए भी दुर्लभ परम स्थान को नित्य प्राप्त करता है। मन्त्र 56 वह परम रूप को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ आनंदित होता है। ॐ समापन इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्

पाठ पढ़ने का तरीका

अर्थ समझने के लिए हिन्दी अर्थ चुनें। मूल पाठ के लिए संस्कृत पाठ और उच्चारण में सहायता के लिए English (Roman) चुनें। पाठ की क्रम संख्या मूल संस्करण के अनुसार रखी गई है। हिन्दी भावार्थ Destiny Grid की सरल व्याख्या है।

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मूल पाठ का संदर्भ: पाठ-स्रोत देखें। पारम्परिक फलश्रुति श्रद्धा का कथन है। संस्करणों में पाठान्तर मिल सकते हैं।