अर्गला स्तोत्र के 27 श्लोक मूल संस्कृत, Roman लिप्यंतरण और सरल हिन्दी भावार्थ सहित पढ़ें। सप्तशती के प्रारम्भिक पाठों में इसका स्थान भी जानें।
अर्गला स्तोत्र पाठ
अक्षर का आकार:पढ़ने का तरीका
अर्गला स्तोत्र
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुरृषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतिपाठाङ्गत्वेन
जपे विनियोगः ।
ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥
निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥
चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥
अर्गला स्तोत्र
oṃ asya śrīargalāstotramantrasya viṣṇurṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrīmahālakṣmīrdevatā, śrījagadambāprītaye saptaśatipāṭhāṅgatvena
jape viniyogaḥ |
oṃ namaścaṇḍikāyai
mārkaṇḍeya uvāca |
oṃ jaya tvaṃ devi cāmuṇḍe jaya bhūtāpahāriṇi |
jaya sarvagate devi kālarātri namo'stu te || 1||
jayantī maṅgalā kālī bhadrakālī kapālinī |
durgā śivā kṣamā dhātrī svāhā svadhā namo'stu te || 2||
madhukaiṭabhavidhvaṃsi vidhātṛvarade namaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 3||
mahiṣāsuranirnāśi bhaktānāṃ sukhade namaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 4||
dhūmranetravadhe devi dharmakāmārthadāyini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 5||
raktabījavadhe devi caṇḍamuṇḍavināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 6||
niśumbhaśumbhanirnāśi trilokyaśubhade namaḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 7||
vanditāṅghriyuge devi sarvasaubhāgyadāyini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 8||
acintyarūpacarite sarvaśatruvināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 9||
natebhyaḥ sarvadā bhaktyā cāparṇe duritāpahe |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 10||
stuvadbhyo bhaktipūrvaṃ tvāṃ caṇḍike vyādhināśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 11||
caṇḍike satataṃ yuddhe jayanti pāpanāśini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 12||
dehi saubhāgyamārogyaṃ dehi devi paraṃ sukham |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 13||
vidhehi devi kalyāṇaṃ vidhehi vipulāṃ śriyam |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 14||
vidhehi dviṣatāṃ nāśaṃ vidhehi balamuccakaiḥ |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 15||
surāsuraśiroratnanighṛṣṭacaraṇe'mbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 16||
vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantañca māṃ kuru |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 17||
devi pracaṇḍadordaṇḍadaityadarpaniṣūdini |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 18||
pracaṇḍadaityadarpaghne caṇḍike praṇatāya me |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 19||
caturbhuje caturvaktrasaṃstute parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 20||
kṛṣṇena saṃstute devi śaśvadbhaktyā sadāmbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 21||
himācalasutānāthasaṃstute parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 22||
indrāṇīpatisadbhāvapūjite parameśvari |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 23||
devi bhaktajanoddāmadattānandodaye'mbike |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 24||
bhāryāṃ manoramāṃ dehi manovṛttānusāriṇīm |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 25||
tāriṇi durgasaṃsārasāgarasyācalodbhave |
rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi || 26||
idaṃ stotraṃ paṭhitvā tu mahāstotraṃ paṭhennaraḥ |
saptaśatīṃ samārādhya varamāpnoti durlabham || 27||
|| iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe argalāstotraṃ samāptam ||
सरल हिन्दी भावार्थ मूल संस्कृत पाठ को समझने के लिए है। प्रत्येक क्रमांक मूल पाठ के मन्त्र-क्रमांक से मेल खाता है; कुछ मन्त्र आधे श्लोक या वक्ता के कथन हैं।
अर्गला स्तोत्र
विनियोग: देवी की प्रसन्नता के लिए सप्तशती के अंग के रूप में इस स्तोत्र के जप का संकल्प किया गया है। देवी चण्डिका को नमस्कार। मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं:
1. चामुण्डा देवी, सभी प्राणियों के दुःख हरने वाली और सर्वत्र विद्यमान कालरात्रि! आपकी जय हो; आपको नमस्कार है।
2. जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा और स्वधा रूपिणी देवी को नमस्कार है।
3. मधु और कैटभ का विनाश करने वाली तथा ब्रह्मा को वर देने वाली देवी को नमस्कार। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
4. महिषासुर का नाश करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली देवी को नमस्कार। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
5. धूम्रनेत्र का वध करने वाली तथा धर्म, उचित कामना और अर्थ प्रदान करने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
6. रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
7. शुम्भ-निशुम्भ का नाश करने वाली और तीनों लोकों का कल्याण करने वाली देवी को नमस्कार। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
8. जिनके दोनों चरण वन्दनीय हैं और जो समस्त सौभाग्य देने वाली हैं, ऐसी देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
9. जिनका स्वरूप और चरित्र चिन्तन की सीमा से परे है तथा जो शत्रुओं का नाश करती हैं, ऐसी देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
10. हे अपर्णा! भक्तिपूर्वक झुकने वालों के दुःख और पाप दूर करने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
11. हे चण्डिका! भक्तिपूर्वक स्तुति करने वालों के रोग हरने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
12. हे पापों का नाश करने वाली चण्डिका! संघर्ष में विजय देने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
13. हे देवी! सौभाग्य, आरोग्य और उत्तम सुख प्रदान करें। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
14. हे देवी! मेरा कल्याण करें और भरपूर समृद्धि दें। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
15. द्वेष रखने वालों के अनिष्ट का नाश करें और प्रबल शक्ति दें। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
16. हे अम्बिका! देवों और असुरों के मुकुटों के रत्न जिनके चरणों से स्पर्श पाते हैं, ऐसी देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
17. मुझे विद्या, यश और समृद्धि से सम्पन्न करें। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
18. अपने प्रचण्ड भुजबल से दैत्यों का अहंकार मिटाने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
19. प्रबल दैत्यों का अभिमान दूर करने वाली चण्डिका! मैं आपके सम्मुख नतमस्तक हूं। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
20. चार भुजाओं वाली और चार मुखों वाले ब्रह्मा से स्तुत परमेश्वरी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
21. कृष्ण द्वारा सदा भक्तिपूर्वक स्तुत अम्बिका! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
22. हिमालय की पुत्री के स्वामी शिव द्वारा स्तुत परमेश्वरी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
23. इन्द्राणी के पति इन्द्र द्वारा सद्भाव से पूजित परमेश्वरी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
24. भक्तजनों को अपार आनन्द देने वाली अम्बिका! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
25. मन को प्रिय और अनुकूल स्वभाव वाली पत्नी प्रदान करें। मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें। यह श्लोक अपने पारम्परिक, पुरुष साधक के कथन-रूप में है।
26. पर्वतराज की पुत्री! कठिन संसार-सागर से पार लगाने वाली देवी! मुझे शोभा, विजय और यश दें तथा द्वेष का नाश करें।
27. इस स्तोत्र के बाद सप्तशती का महान स्तोत्र पढ़ने का निर्देश है। परम्परा में श्रद्धापूर्वक सप्तशती की आराधना को दुर्लभ वर प्राप्त करने वाली साधना कहा गया है।
पाठ पढ़ने का तरीका
अर्थ समझने के लिए हिन्दी अर्थ चुनें। मूल पाठ के लिए संस्कृत पाठ और उच्चारण में सहायता के लिए English (Roman) चुनें। पाठ की क्रम संख्या मूल संस्करण के अनुसार रखी गई है। हिन्दी भावार्थ Destiny Grid की सरल व्याख्या है।
अक्षर बड़े या छोटे कर सकते हैं। पढ़ते समय अपनी जगह सेव करने का विकल्प इसी ब्राउज़र में काम करता है।
मूल पाठ का संदर्भ: पाठ-स्रोत देखें। पारम्परिक फलश्रुति श्रद्धा का कथन है। संस्करणों में पाठान्तर मिल सकते हैं।