कीलक स्तोत्र के सभी 16 श्लोक संस्कृत, Roman लिप्यंतरण और क्रमांकित सरल हिन्दी भावार्थ के साथ पढ़ें।

कीलक स्तोत्र पाठ

सरल हिन्दी भावार्थ मूल संस्कृत पाठ को समझने के लिए है। प्रत्येक क्रमांक मूल पाठ के मन्त्र-क्रमांक से मेल खाता है; कुछ मन्त्र आधे श्लोक या वक्ता के कथन हैं।

कीलक स्तोत्र

विनियोग: देवी की प्रसन्नता के लिए सप्तशती के अंग के रूप में इस स्तोत्र के जप का संकल्प किया गया है। देवी चण्डिका को नमस्कार। मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं: 1. निर्मल ज्ञान-स्वरूप, तीनों वेदों के दिव्य ज्ञान से युक्त और मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले शिव को कल्याण की प्राप्ति के लिए नमस्कार है। 2. इस पाठ को मन्त्रों का कीलक, अर्थात् उनके प्रयोग का बन्धन या रहस्य, समझें। नियमित जप में तत्पर साधक के कल्याण का वर्णन है। 3. देवी की भक्तिपूर्वक स्तुति करने वाले के लिए पारम्परिक उच्चाटन आदि अनुष्ठानों की सिद्धि का वर्णन किया गया है। यह अनुष्ठान-सम्बन्धी कथन है। 4. यहां स्तोत्र-जप की महिमा बताई गई है कि अलग मन्त्र या औषधि आदि साधन के बिना भी परम्परा में बताए कार्य देवी की स्तुति से सिद्ध माने जाते हैं। यह चिकित्सा का निर्देश नहीं है। 5. लोगों की शंका कि ये सभी कार्य कैसे सिद्ध होंगे, उसे ध्यान में रखकर शिव ने इस मंगलकारी साधना का विधान किया। 6. शिव ने चण्डिका के इस स्तोत्र को गूढ़ रखा। पुण्य और उचित साधना से उसके विधान को प्राप्त करने की बात कही गई है। 7. कल्याण की प्राप्ति का आश्वासन स्तोत्र की परम्परागत भाषा में दिया गया है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र होने का उल्लेख अगले श्लोक से जुड़ता है। 8. समर्पण और प्रसाद-ग्रहण की भावना का निर्देश है। शिव द्वारा स्थापित इसी बन्धन को कीलक कहा गया है; इसके विधि-विवरण परम्पराओं में भिन्न हो सकते हैं। 9. कीलक के बन्धन को विधिपूर्वक दूर करके नित्य चण्डी-जप करने वाले के लिए सिद्ध, शिवगण या गन्धर्व जैसी उच्च स्थिति का वर्णन है। 10. पाठ की फलश्रुति में दुर्बलता, भय और अकाल मृत्यु से रक्षा तथा अन्त में मुक्ति का वर्णन है। ये श्रद्धा-परम्परा के कथन हैं। 11. सम्पूर्ण विधि और अर्थ समझकर साधना आरम्भ करने का आग्रह है। ज्ञानी जन बिना समझे आरम्भ करने के बजाय पहले उचित जानकारी प्राप्त करते हैं। 12. सौभाग्य आदि शुभ गुण देवी की कृपा से प्राप्त माने गए हैं; इसलिए इस मंगलकारी पाठ का जप करने को कहा गया है। 13. धीमे जप और ऊंचे स्वर में पाठ के सन्दर्भ में समृद्ध फल का वर्णन है। श्लोक पाठ आरम्भ करने के लिए प्रेरित करता है; पाठ-रीति अपने आचार्य या पारिवारिक परम्परा के अनुसार लें। 14. ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, शत्रु-भय से मुक्ति और परम मोक्ष देवी की कृपा से माने गए हैं; इसलिए उनकी स्तुति करने का आह्वान है। 15. जो मनुष्य हृदय से चण्डिका का निरन्तर स्मरण करता है, उसके हृदय में देवी का वास और प्रिय कामना की प्राप्ति का वर्णन है। 16. आरम्भ में शिवकृत कीलक-निवारण पढ़कर, बन्धन-निवारण के भाव से एकाग्र होकर मुख्य पाठ करने का निर्देश है।

पाठ पढ़ने का तरीका

अर्थ समझने के लिए हिन्दी अर्थ चुनें। मूल पाठ के लिए संस्कृत पाठ और उच्चारण में सहायता के लिए English (Roman) चुनें। पाठ की क्रम संख्या मूल संस्करण के अनुसार रखी गई है। हिन्दी भावार्थ Destiny Grid की सरल व्याख्या है।

अक्षर बड़े या छोटे कर सकते हैं। पढ़ते समय अपनी जगह सेव करने का विकल्प इसी ब्राउज़र में काम करता है।

मूल पाठ का संदर्भ: पाठ-स्रोत देखें। पारम्परिक फलश्रुति श्रद्धा का कथन है। संस्करणों में पाठान्तर मिल सकते हैं।